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वेलेंटाइन डे पर भावनाओं को जिंदा रखने हेतु उपहार देने की प्रथा प्राचीन।

ब्यूरो चीफ़ शहाबुद्दीन अहमद

बेतिया, बिहार।

विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी वैलेंटाइन डे मनाने की प्रथा जोरों पर है,इसको मनाने वालो का कहना है कि वैलेंटाइन डे पर उपहार देने की प्रथा बहुत ही प्राचीन है। समय के साथ साथ उपहारों का स्वरूप भले ही बदल गया हो मकसद वही है। विशेष पल को यादगार बनाना और भावनाओं को जिंदा रखना ही मुख्य है। इस मौके पर नवयुवकों का कहना है कि और कोई भी रहा हो तो प्रेम शब्द हमेशा से चेहरे पर मुस्कान जाता रहता है, यहां बात अलग है कि हर वक्त में इजहारे मोहब्बत का रूप अलग अलग रह रहा है। कभी इसे रूह से महसूस किया जाता है तो कभी ख्यालों में,14 फरवरी को वेलेंटाइन डे मनाने का रिवाज काफी पुराना है,लेकिन इन दिनों इसका प्रचलन बढ़ा हुआ है,ऐसे में इस बात से इसे इंकार नहीं किया जा सकता कि हर कोई अपने प्रिय को खास उपहार देकर इस पर कोई यादगार बनाना चाहता है। वक्त के पन्ने को पलटने पर पता चलता है कि सैकड़ों बरसों से लोग वेलेंटाइन डे को मनाते आ रहे हैं। प्यार का इजहार के रूप में उपहार देते रहते हैं

14 वीं शताब्दी के कवि सिविल सर्वेंट और जिज्ञासु यूरोपीय यात्री जेफ्री चौसर से इस बारे में सबसे पहली जानकारी मिलती है।1380 के दशक की चौसर की कविता द पार्लियामेंट ऑफ 14 फरवरी को प्यार के दिन के रूप में पहला संदर्व माना जाता है। शहीद रोमन संत वैलेंटाइन का पर्व था,लेकिन चौसर ने इसे लोगों के लिए अपने प्रेमियों को चुनने का दिन के रूप में वर्णित किया है। प्रेम बड़ी ही छोटा शब्द है, लेकिन इसे अभिव्यक्त करना कठिन है,इसलिए उपहारों से भावनाओं को अभिव्यक्त करने का प्रचलन शुरू हुआ।उपहारों का यह सिलसिला कविता,गीत, पत्रों,कार्ड,से होता हुआ आज रोज?चॉकलेट,महंगे उपहारों,पत्र तक जा पहुंचा है।

Jr. Seraj Ahmad Quraishi
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