सैय्यद फरहान अहमद
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम है। माहे मुहर्रम का चांद मंगलवार 16 जून की शाम को देखा जाएगा। चांद के दीदार के साथ 17 या 18 जून से 1448 हिजरी का आगाज होगा। इसी के साथ नया इस्लामी साल शुरु होगा। हिजरी सन् का आगाज मुहर्रम महीने से होता है। यौमे आशूरा यानी दसवीं मुहर्रम 26 या 27 जून को पड़ेगी।
चिश्तिया मस्जिद बक्शीपुर के इमाम मौलाना महमूद रजा कादरी ने बताया कि मुहर्रम की पहली तारीख को मुसलमानों के दूसरे खलीफा अमीरुल मोमिनीन हजरत सैयदना उमर रदियल्लाहु अन्हु की शहादत हुई। मुहर्रम को इस्लामी इतिहास की सबसे दुखद घटना के लिए याद किया जाता है। इसी महीने में यजीद नाम के एक जालिम बादशाह ने पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्यारे नवासे हजरत सैयदना इमाम हुसैन रदियल्लाहु अन्हु व उनके साथियों को कर्बला के मैदान में शहीद कर दिया था।
सब्जपोश हाउस मस्जिद जाफरा बाज़ार के इमाम हाफिज रहमत अली निजामी ने कहा कि मुहर्रम दीन-ए-इस्लाम के मुबारक महीनों में से एक है। इस माह में रोजा रखने की खास अहमियत है। विभिन्न हदीसों व अमल से मुहर्रम की पवित्रता व इसकी अहमियत का पता चलता है। मुहर्रम के दसों दिन खुसूसन आशूरा (दसवीं मुहर्रम) के दिन महफिल या मजलिस करना और सही रवायतों के साथ हजरत सैयदना इमाम हुसैन व कर्बला के शहीदों के फजाइल और कर्बला का वाक़यात बयान करना जायज व बाइसे सवाब है। जिस मजलिस में सालिहीन का जिक्र होता है वहां रहमत बरसती है। दसवीं मुहर्रम को फातिहा-नियाज करना, लोगों को पानी व शरबत पिलाना, मिस्कीन मोहताजों को खाना खिलाना, परेशान लोगों की परेशानी को दूर करना सवाब का काम है। नौवीं व दसवीं मुहर्रम का रोजा रखना अफज़ल है। शरीअत के दायरे में रहकर ही कोई काम करें। कुरआन ख्वानी, फातिहा ख्वानी व दुआ ख्वानी करें। पौधा रोपण करें। अमन ओ अमान कायम रखने में प्रशासन की मदद करें।
समाजसेवी नेहाल अहमद ने बताया कि माहे मुहर्रम शुरू होते ही प्रमुख मस्जिदों व घरों में कर्बला के शहीदों की याद में महफिल व मजलिस शुरु होगी। इमामबाड़ा इस्टेट मियां बाजार में तैयारी जारी है। यहां से 5, 9 व 10 मुहर्रम को शाही जुलूस निकाले जाने की परम्परा है। इसके अलावा जिले के विभिन्न मोहल्लों में स्थित इमाम चौकों से चौथी से दसवीं मुहर्रम तक भी जुलूस निकाला जाता है।
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