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प्रचार नहीं, विचार शिक्षा, जनतंत्र और विश्वविद्यालय की भूमिका प्रोफेसर अपूर्वनंद झा का व्याख्यान विस्तृत विवरण

अन्वर कादरी

छत्रपती संभाजीनगर, औरंगाबाद

आयोजन विवेकानंद महविद्यालय में किया गया था उन्हाने कहा आजकल रिवाज़ बदल गया है और यह बात उलटी लग सकती है, लेकिन फिर भी—हम एक महाविद्यालय में हैं, एक शिक्षा संस्थान में हैं—तो यह बात याद रखनी चाहिए कि सभ्य तरीके से किसी को दंडित करना हो, तो सार्वजनिक रूप से उसके सामने उसकी प्रशंसा कर दीजिए।

फिर भी, मैं यह नहीं मानता कि आप लोगों का इरादा ऐसा था। आपकी सदाशयता के लिए मैं आभारी हूँ।

जब मुझे इस व्याख्यान के लिए निमंत्रण मिला, तब मुझे यह पता नहीं था कि यह कोई एक व्याख्यान नहीं, बल्कि पिछले आठ वर्षों से चल रही एक श्रृंखला का हिस्सा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में बीस वर्षों से अधिक समय तक काम करते हुए, और देश के बड़े विश्वविद्यालयों को देखते हुए, मैं यह कह सकता हूँ कि ऐसी व्याख्यान श्रृंखला भारतीय शिक्षा जगत में एक विरल और दुर्लभ बात है। इसके लिए इस महाविद्यालय की प्रशंसा की जानी चाहिए।

जब मैंने इस व्याख्यान श्रृंखला की कल्पना के बारे में सुना—कि इसमें किस तरह के लोगों को बुलाया गया है, और उनके साथ किस तरह संवाद किया गया है—तो मुझे यह समझ में आया कि आपका उद्देश्य किसी एक विचार का प्रचार करना नहीं है। आपका उद्देश्य विचार करना है और संवाद करना है।

और यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रचार और विचार का अंतर प्रचार का उद्देश्य यह होता है कि सुनने वाला सोचना बंद कर दे।

प्रचार आपसे यह माँग करता है कि आप विश्वास करें, मानें और उसके पीछे चलें।

विचार ऐसा नहीं करता।

विचार कहता है—मैं आपके सामने एक प्रस्ताव रख रहा हूँ।

आप उस पर सोचिए। आप असहमत भी हो सकते हैं।आप संवाद कर सकते हैं।

विचार अनुयायी नहीं बनाता।वह विचारकों का एक मंडल बनाता है।और यही विश्वविद्यालय का काम है।विश्वविद्यालय और सत्ता

आज पूरी दुनिया में—सिर्फ भारत में नहीं—इस बात को लेकर गहरा भ्रम है कि विश्वविद्यालय की भूमिका क्या है।

परसों मेरी बात अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक अध्यापक से हो रही थी। उन्होंने बताया कि आज अमेरिका की सरकार विश्वविद्यालयों को यह निर्देश दे रही है कि उन्हें क्या पढ़ाना चाहिए और क्या नहीं। किस तरह के अध्यापक रखे जाएँगे और किस तरह के नहीं।सैकड़ों अध्यापकों को इसलिए हटाया गया क्योंकि सरकार उनके विचारों से सहमत नहीं थी।यह सिर्फ कोलंबिया तक सीमित नहीं है।हार्वर्ड, पेंसिल्वेनिया, येल—लगभग हर बड़े विश्वविद्यालय में यही हो रहा है।

सरकार यह धमकी भी दे रही है कि अगर आदेश नहीं माने गए, तो सरकारी सहायता रोक दी जाएगी।कुछ विश्वविद्यालयों ने यह मान लिया है।कुछ अदालत गए हैं।

संघर्ष चल रहा है।मैं अमेरिका का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि भारत में अमेरिकी विश्वविद्यालयों की बहुत ख्याति है। लेकिन वे इसलिए बड़े नहीं हैं कि वे अमेरिका में हैं। वे इसलिए बड़े हैं क्योंकि उन्होंने पूरी दुनिया की प्रतिभाओं को जगह दी।

प्रिंसटन, आइंस्टीन के बिना प्रिंसटन नहीं होता।आइंस्टीन अमेरिकी नहीं थे।

अमेरिका ने उन्हें तब अपनाया जब वे संकट में थे।ज्ञान की पहली वफादारी

ज्ञान किसी राष्ट्र की सीमा में बंद नहीं रहता।

भौतिकी, रसायन शास्त्र, समाजशास्त्र—इनका संसार अंतरराष्ट्रीय है।ज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति की पहली वफादारी अपने ज्ञान के प्रति होती है, न कि किसी राष्ट्र के प्रति।इसलिए ज्ञान का उद्देश्य किसी को राष्ट्रवादी बनाना नहीं होता।

ज्ञान का उद्देश्य सत्य की खोज होता है।

चहारदीवारी और आज़ादी

विश्वविद्यालय देखने में बंद लगते हैं—चहारदीवारी के भीतर।लेकिन भीतर जो भाव पलता है, वह आज़ादी का भाव है।

यही वह जगह है जहाँ पहली बार छात्राएँ खुद को स्वतंत्र महसूस करती हैं।

जहाँ मित्रताएँ जाति, धर्म और भाषा की सीमाएँ तोड़ती हैं।यह सब विश्वविद्यालय के बाहर संभव नहीं होता।

गुरु–शिष्य परंपरा की सीमाएँ अब मैं गुरु–शिष्य परंपरा की बात करना चाहता हूँ।

कल्पना कीजिए—अगर यह 1926 होता, तो यहाँ स्त्रियों की संख्या बहुत कम होती।

अनुसूचित जाति और जनजाति की उपस्थिति भी लगभग नहीं होती।

आज ऐसा इसलिए संभव हुआ है क्योंकि विश्वविद्यालय गुरु–शिष्य परंपरा पर नहीं, बल्कि जनतांत्रिक परंपरा पर चलते हैं।

गुरु–शिष्य परंपरा में प्रवेश गुरु तय करता है।

और भारतीय परंपरा में इसके उदाहरण हमारे सामने हैं—द्रोणाचार्य और एकलव्य।

परशुराम और कर्ण।

यह परंपरा स्त्रियों और दलितों के लिए बंद थी। गार्गी को कहा गया—अति प्रश्न मत करो।

शंबूक को तपस्या करने के कारण मार दिया गया।संस्कृत जैसी भाषा, जिसे ज्ञान की वाहक कहा जाता है, स्त्रियों और शूद्रों के लिए निषिद्ध थी।

जनतंत्र और शिक्षा आज विश्वविद्यालय जनतांत्रिक हैं, इसलिए यहाँ स्त्रियाँ हैं, दलित हैं, आदिवासी हैं।

यह परिवर्तन गुरु–शिष्य परंपरा से नहीं आया।यह जनतंत्र से आया।

अंतिम बात विश्वविद्यालय का काम आज्ञाकारी नागरिक बनाना नहीं है।

विश्वविद्यालय का काम सोचने वाले मनुष्य बनाना है। प्रचार बंद करता है।

विचार खोलता है और अगर विश्वविद्यालय विचार नहीं करेगा,तो फिर कोई जगह नहीं बचेगी जहाँ हम स्वतंत्र होकर सोच सकें।

Karunakar Ram Tripathi
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