इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐतिहासिक आदेश से संविधान की जीत, प्रशासनिक मनमानी पर करारा तमाचा - ग़ौसे आज़म फाउंडेशन
भारत समाचार न्यूज एजेंसी
जयपुर, राजस्थान।
श्रावस्ती स्थित मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक और स्पष्ट आदेश पर ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने संतोष और खुशी व्यक्त की है।
सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल “ इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम आदेश, बिना मान्यता भी मदरसा चलाना संवैधानिक अधिकार ” विषय पर प्रतिक्रिया देते हुए सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि यह फैसला भारत के संविधान के अनुच्छेद 30(1) की आत्मा और भावना की खुली जीत है, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और संचालित करने का मौलिक अधिकार देता है।
उन्होंने कहा कि लखनऊ पीठ द्वारा दिया गया यह आदेश उन तमाम प्रशासनिक कार्रवाइयों पर कड़ा सवाल खड़ा करता है, जिनमें बिना वैधानिक अधिकार और बिना उचित प्रक्रिया अपनाए मदरसों को सील किया गया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल सरकारी मान्यता न होने के आधार पर, जब कोई मदरसा न तो अनुदान ले रहा हो और न ही मान्यता की मांग कर रहा हो, उसे बंद करना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
*प्रशासनिक अति-उत्साह पर न्यायिक चेतावनी।*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि यह फैसला उन अधिकारियों और व्यवस्थाओं के लिए एक न्यायिक चेतावनी है जो संविधान और क़ानून की सीमाओं से बाहर जाकर शक्ति का प्रयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि न्यायालय प्रशासनिक मनमानी पर समय रहते हस्तक्षेप न करे, तो आम और कमज़ोर नागरिक, विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय, हर मामले में उच्च न्यायालय तक पहुंचने की स्थिति में नहीं होता।
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान सर्वोच्च है, न कि कोई सत्ता या पद और जो भी शासन या प्रशासनिक तंत्र संविधान और कानून की अवहेलना करता है, उसे न्यायिक कसौटी पर उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। न्यायालयों की भूमिका केवल आदेश रद्द करने तक सीमित न रहकर, भविष्य में ऐसी अवैधानिक कार्रवाइयों को रोकने के लिए सख़्त और निवारक संदेश देने की भी है।
*नफ़रत और डर की राजनीति को करारा जवाब।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि यह फैसला उन ताक़तों के लिए करारा जवाब है जो मदरसा शिक्षा को बदनाम करने, डर का माहौल बनाने और अल्पसंख्यकों को संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने का प्रयास करती हैं। हाईकोर्ट का यह आदेश साफ़ करता है कि कानून के राज में दादागिरी, पक्षपात और चयनात्मक कार्रवाई की कोई जगह नहीं।
अंत में उन्होंने कहा कि संविधान, न्यायपालिका और क़ानून के दायरे में रहते हुए शिक्षा, शांति, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द की रक्षा के लिए अपनी लड़ाई हर किसी को पूरी मज़बूती के साथ लड़नी चाहिए।
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